विश्व के सबसे बढ़े गणतंत्र के सभी मतदाताओं और भविष्य के मतदाताओं को 11 वें राष्ट्रीय मतदाता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। 11 वें राष्ट्रीय मतदाता दिवस का थीम (विषय) "सभी मतदाता सशक्त, सतर्क, सुरक्षित एवं जागरूक बनें' " रखा गया है। यह विषय आज के दौर में बहुत सुसंगत है। भारत न केवल सबसे बड़ा गणतंत्र है अपितु विश्व में सबसे अधिक युवा मतदाता भी भारत में ही हैं। विधान सभाओं और लोकसभा के अलावा 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन के उपरांत भारत में पंचायतों तथा नगरीय निकायों के लिए प्रत्यक्ष रूप से मतदान का प्रावधान किया गया है और इसमें 18 वर्ष से ऊपर, पंजीकृत मतदाताओं को वोट डालने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है की मतदाता सशक्त, सतर्क, सुरक्षित एवं जागरूक कैसे बनें ताकि अपने मताधिकार का प्रयोग वे न केवल एक काबिल जनप्रतिनिधि चुनने के लिए कर सकें अपितु उनका मत राष्ट्र निर्माण की नींव का काम करे? आज के डिजिटल युग में हम सबको लगता है की हमारे पास मतदाता के रूप में सभी जानकारी उपलब्ध है और हम मतदान के दौरान इसका सही उपयोग करते हैं। पर क्या यही वास्तविकता है? क्या उक्त प्रत्याशी की जानकारी और उसका या उसके दल के एजेंडा की जानकारी होना ही एक जागरूक मतदाता के रूप में पर्याप्त है?


A woman in a burkha shows off indelible ink on her thumb and her Voter ID Card in her left hand as proof of voting.
Image courtesy of Nilanjan Chowdhury/Wikimedia Commons.

वर्ष 1993 में 73 वें एवं 74 वें संविधान संशोधन के अधिसूचित होने के पश्चात् सभी राज्य सरकारों को राज्य चुनाव आयोग गठित करने और स्थानीय सरकारों के चुनाव करवाने का संवैधानिक दवाब था। यह पहला अवसर था जब पंचायतों में संवैधानिक मर्यादाओं और नियमों का पालन करते हुए चुनाव करवाए जाने थे। लेकिन पंचायतों पर अधिकतर उच्च जाति, पुरुषों और दबंगो का ही वर्चस्व था और पहली बार इस वर्चस्व को चुनौती मिलने वाली थी। इसका एक मुख्य कारण संविधान संशोधनों के अनुरूप महिलाओं और पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जाति एवं जनजाति) को आरक्षण के माध्यम से स्थानीय सरकारों में प्रतिनिधित्व मिलना था। लेकिन राज्य चुनाव आयोगों के सामने न केवल निष्पक्ष रूप से चुनाव करवाने अपितु मतदान के लिए लोगों को प्रेरित करने की सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन कुछ समाज सेवी संस्थायें जो अपने कार्यों के माध्यम से न केवल जमीनी स्तर पर लोगों से सीधी जुड़ीं थीं अपितु उनके कार्य का विस्तार दूर दराज़ के क्षेत्रों तक था, ने इस कार्य को एक चुनौती के तरह स्वीकार किया और राज्य चुनाव आयोगों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर खड़ी हुईं। ऐसा ही समाज सेवी संस्थाओं का एक नेटवर्क प्रिया और उसकी सहयोगी संस्थाओं के रूप में विभिन्न राज्यों में कार्य कर रहा था। और जब पंचायतों के पहले चुनावों को लेकर तैयारियां प्रारम्भ हुईं तो प्रिया और उसकी सहयोगी संस्थाओं ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और यह तय किया की संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप चुनाव होने चाहिए और लोग इनमें बढ़चढ़ कर भाग लें। तब जन्म हुआ 'चुनाव पूर्व मतदाता जागरूकता अभियान' का जिसे PEVAC (या प्री इलेक्शन वोटर अवेयरनेस कैंपेन) के रूप में जाना जाता है।

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PEVAC को राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, केरल, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और बिहार में इन उदेश्यों के साथ लॉन्च किया गया :

  1. पंचायती राज संस्थाओं के लिए एक सक्षम वातावरण को बढ़ावा देना
  2. पंचायतों के चुनाव के संबंध में मतदाता व्यवहार को सकारात्मक तौर पर प्रभावित करना
  3. चुनाव में उम्मीदवारों के व्यवहार को प्रभावित करना
  4. स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान के लिए चुनाव मशीनरी को प्रभावित करना

इस अभियान की विविधता में मतदाताओं और उम्मीदवारों तक पहुंचने के लिए विभिन्न प्रक्रियाओं का उपयोग किया गया। इन दृटिकोणों ने लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने का काम किया। पोस्टर, पैम्फलेट, ऑडियो और वीडियो, पदयात्राओं और समूह चर्चाओं का बड़े पैमाने पर इन राज्यों में उपयोग किया गया इसके अलावा, विभिन्न नवाचारों द्वारा अंतिम व्यक्ति तक पहुँच बनाई गयी। उदाहरण के लिए हिमाचल प्रदेश में सन्देश देने के लिए रेडियो प्रसारण का उपयोग किया गया। मध्य प्रदेश में निरक्षर और हाशिये पर रह रहे समुदायों को ध्यान में रखते हुए पोस्टर तैयार किए गए। उत्तर प्रदेश में हास्य सभाओं और नुक्कड़ नाटकों का आयोजन किया गया। बिहार में जानकारी और सूचना के अंतराल को पूरा करने के लिए ब्लॉक स्तर पर केंद्र स्थापित किए गए और स्थानीय भाषा में अभियान सामग्री तैयार करने पर बल दिया गया ताकि महिलाएं और निरक्षर खुद को इस सार्थक प्रक्रिया से जोड़ सकें। मतदाता सूची, आरक्षण के बारे में जानकारी और मतदान की व्यवस्थाओं का प्रचार प्रसार किया गया। राजस्थान में मार्गदर्शिका तैयार की गयी जिसे राज्य चुनाव आयोग ने प्रत्येक जिले और जन-जन तक पहुँचाया। जबकि बिहार में अलग-अलग रंग के मतपत्रों के बारे में जानकारी दी गयी । राष्ट्रीय मीडिया को पंचायत चुनाव प्रक्रिया को कवर करने के लिए बाध्य किया गया और पंचायत चुनाव के सकारात्मक पहलुओं को उजागर करने पर जोर दिया गया क्योंकि अब तक यह रिपोर्टिंग यह केवल चुनावों में हिंसा और बूथ कैप्चरिंग तक सीमित थी। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु आदि प्रदेशों के मुद्दे हिंदी समाचार पत्रों द्वारा कवर करने पर भी ज़ोर दिया गया। पंचायत चुनावों में महिलाओं की भागीदारी के महत्व को आंध्र प्रदेश में दूरदर्शन के प्राइम टाइम पर भी दिखाया गया। महिलाओं और पिछड़े वर्गों के उम्मीदवारों को सहायता प्रदान करने के लिए एक तंत्र स्थापित किया गया। उदाहरण के लिए, केरल में स्वयं सहायता समूहों (SHGs), आंध्र प्रदेश में दलित महिला मंचों और हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश में महिला मंडलों ने हाशिए पर रह रहे समुदायों को चुनाव प्रक्रिया में शामिल होने में मदद की।

"Durga Parsad an elderly retired policeman from Delhi Police was happy to cast his vote. He retired 27 years ago that he may be more than 85 years old. He proudly showed me ink mark on his index finger." - Quote and image courtesy: Ramesh Lalwani, Flickr.


Image courtesy: Al Jazeera English/Flickr.

प्रथम और द्वितीय चरण के चुनावों में जहां पंचायत चुनावों के सम्बन्ध में समुदायों और मतदाताओं को जागरूक करने, पचायतों चुनावों में अपने मत का सदुपयोग करने, आरक्षित सीटों पर कठपुतली उम्मीदवारों को पहचानने जैसे मुद्दों पर बल दिया वहीँ अगले चरणों के चुनावों में स्थानीय मुद्दों को पहचानने और इनके सम्बन्ध में मतदाताओं को जागरूक करने, उम्मीदवारों पर स्थानीय मुद्दों जैसे महिला हिंसा और कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध काम करने, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं शिशु स्वास्थ्य, स्वच्छता, पानी की उपलब्धता आदि मुद्दों पर चुने जाने के बाद काम करने के लिये शपथ पत्रों, सार्वजानिक वार्ताओं, कलाजथा, सीधी बात आदि के आयोजनों आदि के माध्यम से दवाब बनाने का काम किया गया। उदहारण के लिए वर्ष 2001 में केरल में 3 ब्लॉक की 28 ग्राम पंचायतों में इस प्रकार के 45 जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये गए, तमिलनाडु में पंचायतों के द्वितीय चरण के मतदान में 27 जिलों में 'तमिलनाडु पंचायत राज कैंपेन' के माध्यम से राज्य भर में स्वैच्छिक संगठनों ने अभियान चलाया। बिहार में 350 स्वैच्छिक संगठनों के नेटवर्क के माध्यम से 36 जिलों में अभियान चलाया गया और आंध्र प्रदेश में 7 स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से 10000 ग्राम पंचायतों में जागरूकता कार्यक्रम चलाये गए। वर्ष 2000 में जब गुजरात में पंचायत चुनावों की घोषणा हुई तो सूखे की स्थिति को देखते हुए मतदान को टाल दिया गया लेकिन जल्द ही स्वैच्छिक संगठनों के एक बड़े नेटवर्क ने चुनावों की मांग करते हुए 15 दिन के भीतर 27,723 मतदाताओं के द्वारा हस्ताक्षरित 3000 पत्र, मुख्यमंत्री और मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखीं। इसी प्रकार वर्ष 2005 में 56 स्वैच्छिक संगठनों के नेटवर्क के माध्यम से दो जिलों की 2641 ग्राम पंचायतों और 21 नगर निकायों में जागरूकता अभियान चलाया गया। इसी वर्ष राजस्थान में 200 स्वैच्छिक संगठनों के माध्यम से 32 जिलों की 4188 ग्राम पंचयतों में जागरूकता अभियान चलाया गया। अलग अलग चरणों में इन सभी अभियानों के माध्यम से लगभग 40 करोड़ मतदाताओं को पंचायतों और नगरीय निकायों के सम्बन्ध में जागरूक किया गया जिसने भारत में सुदृढ़ स्थानीय सरकारों की नींव रखने का काम किया। इसमें समुदाय आधारित संस्थाओं, स्वयं सेवी संस्थाओं, सम्बंधित जिला और ब्लॉक स्तरीय विभागों और राज्य चुनाव आयोगों ने साथ मिलकर काम किया। वर्ष 2001 में प्रिया द्वारा आयोजित मुख्य चुनाव आयुक्त श्री जे. एम. लिंगदोह और राज्यों के चुनाव आयुक्तों के राष्ट्रीय सम्मलेन में स्वैच्छिक संगठनों के इस प्रयास को साझा किया गया और यह एक ऐतिहासिक क्षण था जब भारत निर्वाचन आयोग ने PEVAC की सार्थकता और आवश्यकता पर बल देते हुए इसे चुनावों में बड़े पैमाने पर प्रयोग करने की वकालत की I आज भारत निर्वाचन आयोग और राज्य चुनाव आयोगों द्वारा इस प्रक्रिया को विभिन्न रूपों में प्रयोग किया जा रहा है I

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जहाँ एक ओर पहला राष्ट्रीय मतदाता दिवस वर्ष 2011 में मनाया गया था लेकिन स्वैच्छिक संस्थाओं के एक बड़े नेटवर्क ने स्थानीय चुनावों में 1995 के बाद से ही एक बड़ी भूमिका निभाई है जिसने एक स्वस्थ और प्रगतिशील गणतंत्र की नींव रखी है। आज के डिजिटल युग में इन प्रयासों को और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है क्योंकि डिजिटल माध्यमों की अपनी एक सीमा है जो जन जुड़ाव का उस रूप में स्थान नहीं ले सकती जैसी इसकी आवश्यकता है। मतदाता तभी जागरूक होगा यदि हम उसे न केवल सही निर्णय लेने के लिए शिक्षित कर पाएं अपितु समुदायों को सही उम्मीदवार को प्रोत्साहित करने के लिए भी सशक्त कर पाएं। यदि हम वास्तव में सशक्त, सतर्क, सुरक्षित एवं जागरूक मतदाता की अपेक्षा रखते हैं तो हमें PEVAC के अनुभवों से सीखना होगा और निरंतर इस कार्य को बल देना होगा।

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